ऎसे समय जब खाने पीने की वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं और खाद्य मुद्रास्फीति 15 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है तब एक संशोधित अनुमान में देश की प्रति व्यक्ति आय एक साल पहले के मुकाबले 14.5 प्रतिशत बढ़कर 46,492 रूपए सालाना हो
गई है।
सकल राष्ट्रीय आय को 117 करोड़ भारतीयों में बराबर बांटने पर प्रति व्यक्ति आय का यह आंकड़ा आया है। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के ताजा अनुमान के अनुसार वर्तमान बाजार मूल्यों पर प्रति व्यक्ति आय के ये आंकड़े पिछले अनुमान की तुलना में करीब 2,000 रूपए अधिक हैं। इससे पहले 44,345 रूपए सालाना प्रति व्यक्ति आय का अनुमान लगाया गया था।
3875 रूपए मासिक
देश की जनसंख्या मार्च 2010 में 117 करोड़ हो गई। ताजा आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2009-10 में देश की प्रति व्यक्ति आय इससे पिछले साल की तुलना में 14.5 प्रतिशत बढ़कर 46,492 रूपए हो गई। यह पूर्व वर्ष में औसतन 40,605 रूपए आंकी गई थी। मासिक आधार यह आय 3384 रूपए से बढ़कर 3875 रूपए प्रति माह बैठती है।
हालांकि, अगर 2004-05 की कीमतों के आधार पर गणना की जाए तो प्रति व्यक्ति आय में 2009-10 में केवल छह प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिलती है। इन कीमतों के आधार पर वित्त वर्ष 2010 में प्रति व्यक्ति आय 31,801 रूपए रही। मौजूदा कीमतों के आधार पर अर्थव्यवस्था का आकार बीते वित्त वर्ष में 16.1 प्रतिशत बढ़कर 61,33,230 करोड़ रूपए हो गया।
भारत प्यारा देश हमारा, इसकी सूचनाएं और जानकारी हम देंगे
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सोमवार, 31 जनवरी 2011
रविवार, 30 जनवरी 2011
मोबाइल जमाना नवयुवकों को भाया
मोबाइल महिमा आज देद्गा में चरम पर है और यही कारण है कि देद्गा का लगभग ६० प्रतिद्गात युवा संचार क्रान्ति के 'पालने' में झूल रहा है। युवाओं में मोबाइल स्टाइल सिम्बल बन चुका है। मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनियां भी युवाओं को ध्यान में रखते हुए आद्युनिक, किफायती और रुचिपूर्ण सेवांए बाजार में पेद्गा कर रहे हैैं जिससे युवकों में मोबाइल का क्ेज प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। नई टेक्नॉलाजी और सुविधाओं से परिपूर्ण मोबाइल आज पहले की अपेक्षा कम दामों में उपलब्ध हैं। ये मोबाइल कैमरा, आडियो-वीडियो और रेडियो और इन्टरनेट जैसी आदि आद्युनिकतम सेवाओं से लैस हैं। डेटिग-चैटिग या मैसेजिग आद्युनिक युवकों की दिनचर्या बन चुकी है। इन मोबाइल से सम्बधित सुविधाओं सें कोई भी कहीं भी अपने दोस्त - यारों से सम्पर्क में रह सकते हैं क्योंकि अब मोबइल की लोकप्रियता सिर्फ द्गाहरों और कस्बों तक ही सीमित नहीं है बल्कि देद्गा से सुदूर आंचलिक इलाके भी मोबाइल के कवरेज में हैं।
मोबाइल कन्ति का 'लड कियां' भी मजा उठा रही हैं लड कियों की उगलियां मोबाइल पर सरपट दौड ती देखी जा सकती है। लेकिन द्गाहरों की अपेक्षा अभी गांवों में इसका प्रचलन कुछ हद तक कम है कारण द्गाहरी और ग्रामीण माहौल, परन्तु वह दिन अधिक दूर नहीं जब भारत में द्गात प्रतिद्गात मोबाइल धारक हो जाएंगे।
कबूतर, प्रेमपत्र, और फूल के माध्यम से प्यार का इजहार करने का फार्मूला नवयुवकों में पूर्णरूपेण समाप्त हो चुका है। आज की युवा पीढ ी मोबाइल के जरिए मैसेज, एमएमएस, भेज अपने प्यार का इपहार कर रहे है। इसके जरिए प्रेमी - प्रेमिका एक दूसरे को फूल, प्रेम पत्र और न जाने क्या क्या बस कुछ पलों में भेजते हैं। अतः मोबाइल आज के युवा की अहम् जरुरत है।
भारत में पोलियो का सफाया नजदीक
दो बूंद जिंदगी की
पोलियो के खिलाफ लड़ाई में भारत को खासी कामयाबी मिल रही है. देश भर में 2010 के दौरान पोलियो के सिर्फ 42 मामले सामने आए जबकि 2009 में इनकी संख्या 741 थी. सरकार ने कहा पोलियो मुक्त भारत का लक्ष्य पाया जा सकता है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने बताया कि देश में पोलियो उन्मूलन की कोशिशें शुरू होने के बाद से पिछले छह महीनों के दौरान इस बीमारी के सबसे कम मामले देखने में आए हैं. उन्होंने कहा, "2010 में पोलियो के कुल 42 मामले पाए गए जबकि 2009 में 741 लोगों में यह बीमारी पाई गई." आजाद ने बताया कि पोलियो से प्रभावित जिलों की संख्या भी तेजी से घटी है. 2009 में पोलियो ग्रस्त जिलों की संख्या 56 थी जो पिछले साल सिर्फ 17 रह गई है. वहीं 2008 में 90 जिलों में पोलियो का प्रकोप था.
उत्तर प्रदेश में पिछले साल पोलियो के सिर्फ 10 मामले सामने आए जबकि एक साल पहले इनकी संख्या 602 थी. खासकर अप्रैल 2010 के बाद से देश के सबसे घनी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कोई व्यक्ति पोलिया का पीड़ित नहीं मिला. आजाद ने बताया कि रविवार से शुरू होने वाले देश व्यापी अभियान में पांच साल के कम उम्र के 17.4 करोड़ बच्चों को पोलिया की दवा पिलाई जाएगी. मार्च से नवंबर के बीच उन क्षेत्रों में छह अभियान और चलाए जाएंगे जहां पोलिया का सबसे ज्यादा खतरा है. आजाद के मुताबिक, "इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान और गुजरात शामिल हैं."
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि पोलिया के मामलों में गिरावट को देखते हुए पोलियो मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि देश के किसी भी हिस्से में पोलिया का वायरस दिखने पर उससे निपटने के लिए खास कार्यबल का गठन किया जा रहा है ताकि आगे उसका प्रसार न हो सके. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने शनिवार को राष्ट्रपति भवन में सात बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिला कर 2011 के पोलियो उन्मूलन अभियान की शुरुआत की.
पोलियो के खिलाफ लड़ाई में भारत को खासी कामयाबी मिल रही है. देश भर में 2010 के दौरान पोलियो के सिर्फ 42 मामले सामने आए जबकि 2009 में इनकी संख्या 741 थी. सरकार ने कहा पोलियो मुक्त भारत का लक्ष्य पाया जा सकता है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने बताया कि देश में पोलियो उन्मूलन की कोशिशें शुरू होने के बाद से पिछले छह महीनों के दौरान इस बीमारी के सबसे कम मामले देखने में आए हैं. उन्होंने कहा, "2010 में पोलियो के कुल 42 मामले पाए गए जबकि 2009 में 741 लोगों में यह बीमारी पाई गई." आजाद ने बताया कि पोलियो से प्रभावित जिलों की संख्या भी तेजी से घटी है. 2009 में पोलियो ग्रस्त जिलों की संख्या 56 थी जो पिछले साल सिर्फ 17 रह गई है. वहीं 2008 में 90 जिलों में पोलियो का प्रकोप था.
उत्तर प्रदेश में पिछले साल पोलियो के सिर्फ 10 मामले सामने आए जबकि एक साल पहले इनकी संख्या 602 थी. खासकर अप्रैल 2010 के बाद से देश के सबसे घनी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कोई व्यक्ति पोलिया का पीड़ित नहीं मिला. आजाद ने बताया कि रविवार से शुरू होने वाले देश व्यापी अभियान में पांच साल के कम उम्र के 17.4 करोड़ बच्चों को पोलिया की दवा पिलाई जाएगी. मार्च से नवंबर के बीच उन क्षेत्रों में छह अभियान और चलाए जाएंगे जहां पोलिया का सबसे ज्यादा खतरा है. आजाद के मुताबिक, "इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान और गुजरात शामिल हैं."
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि पोलिया के मामलों में गिरावट को देखते हुए पोलियो मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि देश के किसी भी हिस्से में पोलिया का वायरस दिखने पर उससे निपटने के लिए खास कार्यबल का गठन किया जा रहा है ताकि आगे उसका प्रसार न हो सके. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने शनिवार को राष्ट्रपति भवन में सात बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिला कर 2011 के पोलियो उन्मूलन अभियान की शुरुआत की.
सोमवार, 24 जनवरी 2011
दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक केंद्रों में लखनऊ भी


लंदन, 24 जनवरी (प्रेट्र) : भारत विश्व के पर्यटकों के लिए लगातार आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। एक नए सर्वेक्षण ने फिर इस पर मोहर लगा दी है। दुनिया के 50 उत्कृष्ट सांस्कृतिक केंद्रों में भारत के तीन शहरों लखनऊ, आगरा और जयपुर को शामिल किया गया है। इनमें आगरा शीर्ष पर है, जहां दुनिया के सात अजूबों में से एक ताजमहल है। संडे टेलीग्राफ व ट्रैवल विशेषज्ञ पेज एंड माय द्वारा यह सूची जारी की गई है। सूची में जयपुर को 27वां और लखनऊ को 32वां स्थान हासिल हुआ है। आगरा में ताजमहल के साथ पर्यटकों से किले, फतेहपुर सीकरी, एतमाद-उद-दौला के मकबरे, वृंदावन और भरतपुर के पक्षी अभयारण्य को देखने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा अन्य महान सांस्कृतिक केंद्रों में एमस्टर्डम, अंगकोरवाट, एथेंस, बैंकॉक, बार्सिलोना, बीजिंग, बुखारा, काहिरा, इस्तांबुल, यरुशलम, क्योटो, सिडनी, तेहरान, वेनिस, वियाना और वारसा भी हैं।
पहला पृष्ठ 132 | 74 आपको पता है भारत में एक नहीं तीन-तीन 'ताजमहल' हैं!



ताजमहल कहां है? यह सवाल जितनी बार जहन में आत है उतनी बार एक ही जवाब जुबान पर आता है और वो है आगरा। लेकिन यह बात जान कर आपको हैरानी होगी कि भारत में एक नहीं तीन ताजमहल हैं।
विशेषज्ञों से बातचीत के दौरान पता चला कि मुगल बादशाह शाहजहां को ताजमहल बनवाने का खयाल अपने पिता जहांगीर की बेगम नूरजहां के पिता एतमादुद्यौला का मकबरा देख कर आया था। यमुना नदी के किनारे स्थित इस मकबरे का निर्माण 1625 में किया गया था। बेबी ताज के नाम से मशहूर इस मकबरे की कई चीजों का इस्तेमाल शाहजहां ने ताजमहल बनवाते समय किया था। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि यही वह मकबरा है जो भारत में पहला ऐसा मकबरा था जो पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनाया गया था।
इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि इस मकबरे को देख कर मुमताज ने शाहजहां से अपनी मृत्यु के बाद ऐसा ही खूबसूरत मकबरा बनवाने की गुजारिश की थी। जो मुमताज की मृत्यु के बाद शाहजहां ने आगरा में बने भव्य ताजमहल को बनवा कर पूरी कर दी थी।
इस तरह देखा जाए तो ताजमहल और बेबी ताज को मिला कर भारत में दो ताजमहल हैं। लेकिन विशेषज्ञों की माने तो भारत में तीसरा ताजमहल भी है। और वह महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में । इस ताजमहल को मिनी ताजमहल के नाम से जाना जाता है। जबकी इसका वास्तविक नाम बीबी का मकबरा है। यह शाहजहां के सुपुत्र औरंगजेब की बेगम साहिबा की समाधि है।
इस मकबरे को देख कर आप हैरान रह जाएंगे क्योंकि इसे बाहर से देखने पर यह बिलकुल ताजमहल की कार्बन कॉपी लगता है। बताया जाता है कि इस मकबरे को औरंगजेब ने ताजमहल के निर्माण के बाद बचे हुए सामान से बनवाया था। गौरतलब है कि औरंगजेब ने अपने अय्याश पिता शाहजहां को ताजमहल के सामने बने लालकिले मे नजरबंद कर दिया था। जिसके बाद ही उसने अपनी बेगम के लिए यह मकबरा बनवाया था।
सूचना-
आने वाली 18 फरवरी से ताज महोत्सव शुरू होने वाला है। इस उत्सव के दौरान दैनिक भास्कर.कॉम ताजमहल के इतिहास और उससे जुड़ी कुछ रोचक बातों से अपने पाठकों को रू-ब-रू करवाने का प्रयास करेगा। पाठकों से गुजारिश है कि वह भी ताजमहल से जुड़े अपने अनुभव और तस्वीरों को हमसे बांटे। हम आपके अनुभवों और तस्वीरों को वेबसाईट पर आपके नाम से पब्लिश करेंगे। अपने अनुभवों और तस्वीरों को (news@imcl.co.in)
यह औरंगाबाद, महाराष्ट्र में स्थित है। यह मकबरा अकबर एवं शाहजहाँ के काल के शाही निर्माण से अंतिम मुगलों के साधारण वास्तुकला के परिवर्तन को दर्शाता है। ताजमहल से तुलना के कारण ही यह उपेक्षा का कारण बना रहा। सम्राज्ञी नूरजहां ने अपने पिता की स्मृति में आगरा में एतमादुद्दौला का मकबरा बनवाया था। यह उसके पिता घियास-उद-दीन बेग़, जो जहांगीर के दरबार में मंत्री भी थे, की याद में बनवाया गया था।
शनिवार, 22 जनवरी 2011
अश्लील ईमेल भेजने पर वीसी का इस्तीफा
राजीव गांधी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के. सी. बेलियप्पा ने गत 31 दिसंबर को इस्तीफा दे दिया और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने तत्काल प्रभाव से उसे स्वीकार कर लिया। मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा गठित एक कमिटी ने उन्हें एक एसोसिएट लेडी प्रफेसर को अश्लील ईमेल भेजने का दोषी पाया था।
प्रफेसर ने पिछले साल 3 अप्रैल को यहां वाइस चांसलर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। इसमें उन्होंने शिकायत की थी कि बेलियप्पा ने उन्हें 'आपत्तिजनक ' ईमेल भेजा था। इसके बाद बेलियप्पा को गिरफ्तार कर लिया गया था।
बेलियप्पा ने पहले कहा था कि उन्हें लेडी प्रोफेसर की ओर से एक ईमेल मिला था, जिसका उन्होंने जवाब भर दिया था। इस पर प्रफेसर का कहना था कि किसी ने उनका ईमेल अकाउंट हैक कर लिया था और उससे बेलियप्पा और 20 अन्य को 'आपत्तिजनक ' संदेश भेज दिए थे।
www.thenews1.com
23-01-2011
प्रफेसर ने पिछले साल 3 अप्रैल को यहां वाइस चांसलर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। इसमें उन्होंने शिकायत की थी कि बेलियप्पा ने उन्हें 'आपत्तिजनक ' ईमेल भेजा था। इसके बाद बेलियप्पा को गिरफ्तार कर लिया गया था।
बेलियप्पा ने पहले कहा था कि उन्हें लेडी प्रोफेसर की ओर से एक ईमेल मिला था, जिसका उन्होंने जवाब भर दिया था। इस पर प्रफेसर का कहना था कि किसी ने उनका ईमेल अकाउंट हैक कर लिया था और उससे बेलियप्पा और 20 अन्य को 'आपत्तिजनक ' संदेश भेज दिए थे।
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23-01-2011
ब्राम्हमण और श्रमण परंपरा
इस धरती पर दो ही परम्परा प्रचलन में रही हैं- ब्राह्मण और श्रमण। यह कहना कि ब्राह्मण परम्परा सर्वाधिक प्राचीन है तो बात अधूरी होगी और यह भी सही नहीं कि श्रमण पहले हुए। बस इतना समझ लें कि इन्हीं से ईश्वरवादी और अनिश्वरवादी धर्मों की उत्पत्ति हुई है।
WDचाहे हिंदू, पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम हो या फिर चर्वाक, जैन, शिंतो, कन्फ्युशियस या बौद्ध हो, आज धरती पर जितने भी धर्म हैं, उन सभी का आधार यही प्राचीन परम्परा रही है। इसी परम्परा ने वेद लिखे और इसी से जिनवाद की शुरुआत हुई। यही परम्परा आगे चलकर आज हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म कहलाती है। हजारों वर्षों के इस सफर में इस परम्परा ने बहुत कुछ खोया और इसमें बहुत कुछ बदला गया। आज जिस रूप में यह परम्परा है यह बहुत ही चिंतनीय विषय होगा, उनके लिए जो इस परम्परा के जानकार हैं।
अरिष्टनेमि और कृष्ण तक तो यह परम्परा इस तरह साथ-साथ चली कि इनके फर्क को समझना आमजन के लिए कठिन ही था लेकिन बस यहीं से धर्म के व्यवस्थीकरण की शुरुआत हुई तो फिर सब कुछ अलग-अलग होता गया।
ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता हो और वेद वाक्य को ही ब्रह्म वाक्य मानता हो। ब्राह्मणों अनुसार ब्रह्म, और ब्रह्मांड को जानना आवश्यक है तभी ब्रह्मलीन होने का मार्ग खुलता है। श्रमण वह जो श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता हो और जिसके लिए व्यक्ति के जीवन में ईश्वर की नहीं श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा तथा संप्रदायों का उल्लेख प्राचीन बौद्ध तथा जैन धर्मग्रंथों में मिलता है तथा ब्राह्मण परम्परा का उल्लेख वेद, उपनिषद और स्मृतियों में मिलता है।
आज ब्राह्मण और श्रमण शब्द के अर्थ बदल गए हैं। यह जातिसूचक शब्द से ज्यादा कुछ नहीं। उक्त शब्दों को नहीं समझने के कारण अब इनकी गरिमा नहीं रही। दरअसल यह उन ऋषि-मुनियों की परम्परा या मार्ग का नाम था जिस पर चलकर सभी धर्म और जाति के लोगों ने मोक्ष को पाया। यह ऐसा ही है कि हम ऋषि और मुनि नाम की कोई जाति निर्मित कर लें और फिर उक्त शब्दों की गरिमा को भी खत्म कर दें।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि उक्त दोनों परम्परा को जितना नुकसान इस परम्परा को मानने वालों से हुआ उतना ही नुकसान इस परम्परा को तोड़-मरोड़कर एक नई परम्परा को गढ़ने वालों से भी हुआ। इस सबके बीच कुछ लोग थे जिन्होंने उक्त परम्परा को उसके मूल रूप में बचाए रखा।
WDचाहे हिंदू, पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम हो या फिर चर्वाक, जैन, शिंतो, कन्फ्युशियस या बौद्ध हो, आज धरती पर जितने भी धर्म हैं, उन सभी का आधार यही प्राचीन परम्परा रही है। इसी परम्परा ने वेद लिखे और इसी से जिनवाद की शुरुआत हुई। यही परम्परा आगे चलकर आज हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म कहलाती है। हजारों वर्षों के इस सफर में इस परम्परा ने बहुत कुछ खोया और इसमें बहुत कुछ बदला गया। आज जिस रूप में यह परम्परा है यह बहुत ही चिंतनीय विषय होगा, उनके लिए जो इस परम्परा के जानकार हैं।
अरिष्टनेमि और कृष्ण तक तो यह परम्परा इस तरह साथ-साथ चली कि इनके फर्क को समझना आमजन के लिए कठिन ही था लेकिन बस यहीं से धर्म के व्यवस्थीकरण की शुरुआत हुई तो फिर सब कुछ अलग-अलग होता गया।
ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता हो और वेद वाक्य को ही ब्रह्म वाक्य मानता हो। ब्राह्मणों अनुसार ब्रह्म, और ब्रह्मांड को जानना आवश्यक है तभी ब्रह्मलीन होने का मार्ग खुलता है। श्रमण वह जो श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता हो और जिसके लिए व्यक्ति के जीवन में ईश्वर की नहीं श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा तथा संप्रदायों का उल्लेख प्राचीन बौद्ध तथा जैन धर्मग्रंथों में मिलता है तथा ब्राह्मण परम्परा का उल्लेख वेद, उपनिषद और स्मृतियों में मिलता है।
आज ब्राह्मण और श्रमण शब्द के अर्थ बदल गए हैं। यह जातिसूचक शब्द से ज्यादा कुछ नहीं। उक्त शब्दों को नहीं समझने के कारण अब इनकी गरिमा नहीं रही। दरअसल यह उन ऋषि-मुनियों की परम्परा या मार्ग का नाम था जिस पर चलकर सभी धर्म और जाति के लोगों ने मोक्ष को पाया। यह ऐसा ही है कि हम ऋषि और मुनि नाम की कोई जाति निर्मित कर लें और फिर उक्त शब्दों की गरिमा को भी खत्म कर दें।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि उक्त दोनों परम्परा को जितना नुकसान इस परम्परा को मानने वालों से हुआ उतना ही नुकसान इस परम्परा को तोड़-मरोड़कर एक नई परम्परा को गढ़ने वालों से भी हुआ। इस सबके बीच कुछ लोग थे जिन्होंने उक्त परम्परा को उसके मूल रूप में बचाए रखा।
शुक्रवार, 21 जनवरी 2011
साली को हो गया जीजा से प्यार, मां बनी
बुलंदशहर।। प्रेग्नेंसी के दौरान बड़ी बहन के पास उनकी देख-रेख करने आई लड़की जीजा को दिल दे बैठी। दोनों के इश्क का खुलासा तब हुआ जब लड़की गर्भवती हो गई। उसने एक बच्चे को भी जन्म दे दिया है। अब वह जीजा के पास ही रहने की जिद पर अड़ी हुई है। बड़ी बहन और उनके परिवार वाले असमंजस में हैं।
बुलंदशहर के गुलावठी में लड़की की बहन की अप्रैल में डिलिवरी हुई थी। उसकी देख-रेख करने के लिए उसका पति ससुराल से अपनी साली हेमा (बदला नाम) को ले आया। हेमा इंटर की छात्रा है। उसका जीजा फौज में नौकरी करता है। उस समय वह दो-तीन महीने की छुट्टी लेकर अपने घर आया हुआ था। इसी दौरान जीजा-साली को प्यार हो गया। एक दिन हेमा को उसकी बड़ी बहन ने आपत्तिजनक हालत में अपने पति के साथ देख लिया। उसने अपने पति से इसका विरोध किया तो पति ने साली से अलग होने पर जहर खाकर मरने की धमकी दी।
मामले की सूचना हेमा की मां को दी गई। मां उसके पास पहुंची तो बताया गया कि वह जीजा के बच्चे की मां बनने वाली है। इसके चलते वह जीजा के घर ही रही और एक बच्चे को भी जन्म दे दिया। अब लड़की का कहना है कि वह जीजा को अपना पति स्वीकार कर चुकी है।
बुलंदशहर के गुलावठी में लड़की की बहन की अप्रैल में डिलिवरी हुई थी। उसकी देख-रेख करने के लिए उसका पति ससुराल से अपनी साली हेमा (बदला नाम) को ले आया। हेमा इंटर की छात्रा है। उसका जीजा फौज में नौकरी करता है। उस समय वह दो-तीन महीने की छुट्टी लेकर अपने घर आया हुआ था। इसी दौरान जीजा-साली को प्यार हो गया। एक दिन हेमा को उसकी बड़ी बहन ने आपत्तिजनक हालत में अपने पति के साथ देख लिया। उसने अपने पति से इसका विरोध किया तो पति ने साली से अलग होने पर जहर खाकर मरने की धमकी दी।
मामले की सूचना हेमा की मां को दी गई। मां उसके पास पहुंची तो बताया गया कि वह जीजा के बच्चे की मां बनने वाली है। इसके चलते वह जीजा के घर ही रही और एक बच्चे को भी जन्म दे दिया। अब लड़की का कहना है कि वह जीजा को अपना पति स्वीकार कर चुकी है।
ताजमहल सिर्फ अमीरों के लिए!
जिस प्रेम के बेमिसाल प्रतीक ताजमहल को देखकर दुनिया भर के प्रेमी युगल कई जन्मो तक साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाते रहे हैं, उसे सिर्फ रईसों के लिए सीमित करने की वकालत की जा रही है।
ब्रिटेन की प्रतिष्ठित फ्यूचर लेबोरेटरी के एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में ताजमहल, मिस्र के पिरामिड और वेनिस को धनी वर्ग के लिए खेल का विशेष मैदान बना दिया जाना चाहिए ताकि उन्हें संरक्षित किया जा सके।
उसने चेतावनी दी कि इन विश्व विरासत स्थलों को बचाने के लिए यदि यह कार्रवाई नहीं की गई तो पर्यटन के भारी दबाव के कारण हम अगले 20 वर्षों में इसे खो देंगे।
‘डेली एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक ये विश्व विरासतें केवल धनी लोगों के लिए सीमित की जानी चाहिए और आम पर्यटकों के देखने के लिए अलग से एक प्लेटफार्म बनाया जाना चाहिए।
भविष्यवेत्ता लॉन पियर्सन ने कहा कि भविष्य में हम जहाँ चाहते हैं वहाँ नहीं जा सकेंगे। आने वाले समय में पर्यटन की सुविधाएँ कुछ स्थलों पर होंगी और केवल धनी और प्रसिद्ध व्यक्ति ही इन पर्यटन स्थलों का टिकट खरीद पाएँगे।
गुरुवार, 20 जनवरी 2011
जीवन का नेटवर्क फेल कर देगें ''मोबाइल टावर''
आखिर आवाज को ही क्यों दाबा जाता है ?
सच है कि मानव अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद से गुजर सकता है चाहे बात पर्यावरण की हो या फिर स्वयं मानव की इसी का जीता जागता उदाहरण है सूचना क्रान्ति का ''खम्बा'' जी हां बात हो रही है मोबाइल कंपनियों के टावरों की है। जो द्राहरों से होते हुए गांव देहातों की खेतों तक जा पहॅुचे है। द्राुरु में कुछ मीडिया ने भीड़-भाड इलाके में लगें इन टावरों पर लिखा तो पर ''कमाऊ खम्भा'' होने की वजह से और विज्ञापनों के कारण उनको इन पर लिखना बंद करना पड ा। आखिर क्या पैसे के खातिर ये कंपनिया लोगों के भविद्गय के साथ नही मजाक कर रही है। और सरकारें सिर्फ अकूत धन आते देख इन पर कार्यवाही करने से बच रही है।
मोबाइल टावरों के प्रभाव
पर्यावरण पर प्रभाव : -
१-वायुमण्डल की वायु में व्याप्त सूक्ष्म जीव टावरों से निकली किरणों से अपने कार्य से हट जाते है व भटकते भटकते कई नेटवर्को में फस या तो जल जाते है या फिर घायल हो जाते है।
कारणः- विभिन्न कंपनियों के टावरों से निकलने वाली किरणे अलग-अलग फ्रक्वेंसी की होती है जिनका वातावरण में स्पेच्च तय होता है जब ये दूसरे कंपनी के नेटवर्क से टकराती है तो इस तरह की स्थित उत्पन्न हो जाती है।
२-फसलों पर भी मोबाइल सिग्नलों का बुरा प्रभाव होता है फसली पौध का परागण करने वाले जीव इसके नेटवर्क से ग्रुप में नही रह पाते और बिखर जाते है जिसका सीधा प्रभाव फसल की उपज पर पड ता है।
३- मोबाइल टावर जहां स्थापित होते है वहां जेनरेटर सहित कई द्विगामी रेडियो फ्रेक्वंसी उत्पन्न करने वाले संयत्र स्थापित किए जाते है जो आस पड ोस में तय सीमा से अधिक मात्रा से द्राोर फैलाते है।
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सच है कि मानव अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद से गुजर सकता है चाहे बात पर्यावरण की हो या फिर स्वयं मानव की इसी का जीता जागता उदाहरण है सूचना क्रान्ति का ''खम्बा'' जी हां बात हो रही है मोबाइल कंपनियों के टावरों की है। जो द्राहरों से होते हुए गांव देहातों की खेतों तक जा पहॅुचे है। द्राुरु में कुछ मीडिया ने भीड़-भाड इलाके में लगें इन टावरों पर लिखा तो पर ''कमाऊ खम्भा'' होने की वजह से और विज्ञापनों के कारण उनको इन पर लिखना बंद करना पड ा। आखिर क्या पैसे के खातिर ये कंपनिया लोगों के भविद्गय के साथ नही मजाक कर रही है। और सरकारें सिर्फ अकूत धन आते देख इन पर कार्यवाही करने से बच रही है।
मोबाइल टावरों के प्रभाव
पर्यावरण पर प्रभाव : -
१-वायुमण्डल की वायु में व्याप्त सूक्ष्म जीव टावरों से निकली किरणों से अपने कार्य से हट जाते है व भटकते भटकते कई नेटवर्को में फस या तो जल जाते है या फिर घायल हो जाते है।
कारणः- विभिन्न कंपनियों के टावरों से निकलने वाली किरणे अलग-अलग फ्रक्वेंसी की होती है जिनका वातावरण में स्पेच्च तय होता है जब ये दूसरे कंपनी के नेटवर्क से टकराती है तो इस तरह की स्थित उत्पन्न हो जाती है।
२-फसलों पर भी मोबाइल सिग्नलों का बुरा प्रभाव होता है फसली पौध का परागण करने वाले जीव इसके नेटवर्क से ग्रुप में नही रह पाते और बिखर जाते है जिसका सीधा प्रभाव फसल की उपज पर पड ता है।
३- मोबाइल टावर जहां स्थापित होते है वहां जेनरेटर सहित कई द्विगामी रेडियो फ्रेक्वंसी उत्पन्न करने वाले संयत्र स्थापित किए जाते है जो आस पड ोस में तय सीमा से अधिक मात्रा से द्राोर फैलाते है।
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