आखिर आवाज को ही क्यों दाबा जाता है ?
सच है कि मानव अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद से गुजर सकता है चाहे बात पर्यावरण की हो या फिर स्वयं मानव की इसी का जीता जागता उदाहरण है सूचना क्रान्ति का ''खम्बा'' जी हां बात हो रही है मोबाइल कंपनियों के टावरों की है। जो द्राहरों से होते हुए गांव देहातों की खेतों तक जा पहॅुचे है। द्राुरु में कुछ मीडिया ने भीड़-भाड इलाके में लगें इन टावरों पर लिखा तो पर ''कमाऊ खम्भा'' होने की वजह से और विज्ञापनों के कारण उनको इन पर लिखना बंद करना पड ा। आखिर क्या पैसे के खातिर ये कंपनिया लोगों के भविद्गय के साथ नही मजाक कर रही है। और सरकारें सिर्फ अकूत धन आते देख इन पर कार्यवाही करने से बच रही है।
मोबाइल टावरों के प्रभाव
पर्यावरण पर प्रभाव : -
१-वायुमण्डल की वायु में व्याप्त सूक्ष्म जीव टावरों से निकली किरणों से अपने कार्य से हट जाते है व भटकते भटकते कई नेटवर्को में फस या तो जल जाते है या फिर घायल हो जाते है।
कारणः- विभिन्न कंपनियों के टावरों से निकलने वाली किरणे अलग-अलग फ्रक्वेंसी की होती है जिनका वातावरण में स्पेच्च तय होता है जब ये दूसरे कंपनी के नेटवर्क से टकराती है तो इस तरह की स्थित उत्पन्न हो जाती है।
२-फसलों पर भी मोबाइल सिग्नलों का बुरा प्रभाव होता है फसली पौध का परागण करने वाले जीव इसके नेटवर्क से ग्रुप में नही रह पाते और बिखर जाते है जिसका सीधा प्रभाव फसल की उपज पर पड ता है।
३- मोबाइल टावर जहां स्थापित होते है वहां जेनरेटर सहित कई द्विगामी रेडियो फ्रेक्वंसी उत्पन्न करने वाले संयत्र स्थापित किए जाते है जो आस पड ोस में तय सीमा से अधिक मात्रा से द्राोर फैलाते है।
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