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रविवार, 20 फ़रवरी 2011

टैगोर का नहीं रघुनाथ का राष्ट्रगान गा रहे बच्चे

अंबेडकर नगर अंबेडकर नगर जिले के उतरेथू बाजार स्थित एक निजी विद्यालय ने राष्ट्रगान की शब्दावली बदल डाली। प्रबंधक द्वारा संशोधित राष्ट्रगान पिछले एक माह से प्रार्थना के समय गाया जा रहा है। वहीं, एडीएम एसपी आनंद कहते हैं कि राष्ट्रगान में बदलाव अक्षम्य है। यह राष्ट्र का अपमान है। जांच कराकर दोषियों पर कठोर कार्रवाई करेंगे। बीएसए राकेश कुमार का कहना है कि राष्ट्रगान में बदलाव की बात सही निकली तो विद्यालय की मान्यता समाप्त कर दी जाएगी। जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर स्थित उतरेथू बाजार राहतनगर में लार्ड बुद्धा अंबेडकर अर्जक मिशन नामक पब्लिक स्कूल है। बेसिक शिक्षा परिषद से पांचवी तक मान्यता प्राप्त इस स्कूल में 400 बच्चे पंजीकृत हैं। तकरीबन एक माह पहले विद्यालय के प्रबंधक रघुनाथ सिंह ने राष्ट्रगान की कुछ पंक्तियों के शब्दों को बदल दिया। छात्र विद्यालय की प्रार्थना में अब संशोधित राष्ट्रगान गा रहे हैं। राष्ट्रगान की दूसरी पंक्ति में उल्लिखित अधिनायक शब्द की जगह उत्प्रेरक शब्द का उच्चारण हो रहा है, तीसरी पंक्ति के भारत भाग्य विधाता को बदले स्वरूप में स्वर्णिम भारत निर्माण कहा जा रहा है। तव शुभ आशिष मांगे को तब शुभ कामना मांगे गाया जा रहा है। अंत में जय हे के पश्चात जय लार्ड बुद्धा कहकर राष्ट्रगान समाप्त किया जाता है। प्रबंधक रघुनाथ सिंह ने राष्ट्रगान में संशोधन को राष्ट्र के प्रति निष्ठा व आजादी का प्रतीक बताया है। उन्होंने कहा, अधिनायक शब्द राजा को संबोधन के लिए था। अब हम स्वतंत्र हैं। प्रजातंत्र में अधिनायक शब्द के कोई मायने नहीं। वह अन्य शब्दों में भी बदलाव को सही बताते हैं। वे इसे राष्ट्र का अपमान नहीं बल्कि स्वाभिमान मानते हैं।

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कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल) उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश के बीच दस साल से लटके संपत्ति बंटवारे का ही नतीजा है कि स्कूल को मान्यता उत्तराखंड ने दी है और उसका संचालन कर रहा है यूपी का सिंचाई विभाग। परिसंपत्तियों को लेकर दोनों राज्यों के बीच की तनातनी का खामियाजा भुगत रहे हैं स्कूल में पढ़ने वाले 155 बच्चे, जिन्हें मिडडे मील के रूप में दो मुट्ठी चावल तक नसीब नहीं। उत्तराखंड के पौड़ी जिले में स्थित कालागढ़ के रामगंगा परियोजना प्राथमिक विद्यालय की विभिन्न कक्षाओं में तकरीबन 155 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। कभी एशिया के सबसे बड़े स्कूल का तमगा पा चुके इस विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। 90 फीसदी बच्चे अनुसूचित जाति/जनजाति/ पिछड़ा वर्ग से हैं, लेकिन उन्हें केंद्र सरकार की मिडडे मील योजना का लाभ हासिल नहीं है, क्योंकि स्कूल दो राज्यों की कश्मकश का शिकार है। उत्तराखंड शिक्षा विभाग के अधिकारी कह रहे हैं कि उनके यहां से सिर्फ मान्यता दी गई है। जाहिर है मिड-डे मील उनकी जिम्मेदारी नहीं। यूपी सिंचाई विभाग के अफसरों का कहना है कि वे उप्र शासन को प्रस्ताव भेज चुके हैं कि स्कूल को शिक्षा विभाग अपने अधीन ले ले, लेकिन शासन से इसका कोई जवाब नहीं आया। बच्चों को क्या पता कि उनकी भाग्य विधाता बनीं सरकारें क्या गुल खिला रही हैं। बड़ों के बीच चल रहे मनमुटाव का

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