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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011
postmoderm
कानपुर पोस्टमार्टम हाउस के बाहर पहुंचते ही भले ही हर कोई हवा में उड़ने वाली बदबू से बचने के लिए नाक पर रुमाल रख लेता हो, लेकिन जरा उन चिकित्सकों के बारे में सोचिए जो कई बार हफ्ते भर पुराने सड़े-गले शवों का पोस्टमार्टम कर सही तथ्यों तक पहुंचने का पुरजोर प्रयास करते हैं। लेकिन इस महत्वपूर्ण काम के लिए अगर मात्र दस रुपये भत्ता मिलता हो तो लापरवाही भरा रवैया आने से भला कौन रोक सकता है। सूबे में पिछले 26 वर्षो से चिकित्सकों को एक शव के पोस्टमार्टम का सिर्फ 10 रुपये भत्ता दिया जा रहा है, जबकि केंद्र सरकार एक शव के पोस्टमार्टम के लिए अपनी सेवाओं में तैनात चिकित्सक को एक हजार रुपये भत्ता देती है। शवों के पोस्टमार्टम में इतना कम भत्ता मिलने के चलते पीएमएस संवर्ग के चिकित्सकों ने बीते एक दशक से यह भत्ता लेना ही बंद कर रखा है। नगर क्षेत्र में तैनात सरकारी चिकित्सकों की रोटेशन के आधार पर सीएमओ द्वारा पोस्टमार्टम ड्यूटी लगायी जाती है। लेकिन संबंधित चिकित्सकों द्वारा लंबे समय से भत्ता नहीं लेने के बावजूद अभी तक किसी भी जिम्मेदार ने इस मामले में कोई पहल नहीं की है। जीएसवीएम मेडिकल कालेज से सम्बद्ध हैलट अस्पताल स्थित पोस्टमार्टम हाउस में औसतन हर साल 3,200 शवों का पोस्टमार्टम किया जाता है। इस हिसाब से पिछले दस साल में चिकित्सकों का शवों के पोस्टमार्टम की मद में 32,000 रुपया बकाया है। पोस्टमार्टम भत्ते को लेकर सरकार की उदासीनता व उपेक्षा के बाद भी चिकित्सकों ने कभी किसी शव का पोस्टमार्टम करने से मना नहीं किया है। इस संबंध में उनका कहना है कि रिश्तेदार या करीबी की मौैत से यहां आने वाले परिजन पहले ही परेशान व मजबूर होते हैं। तकलीफ न हो, इसलिए कभी इस मुद्दे पर काम रोकने जैसा विचार ही नहीं आया। 1984 का शासनादेश न्यायिक प्रक्रिया में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के लिए चिकित्सकों का भत्ता वर्ष 1984 के आदेश से निर्धारित किया गया था। उस समय पेट्रोल की कीमत छह रुपये प्रति लीटर थी जो अब 60 रुपये प्रति लीटर पहुंच गयी है। लेकिन भत्ता नहीं बढ़ा है, इसी कारण चिकित्सकों ने लेना बंद कर दिया है। -डॉ के स्वरूप, अध्यक्ष पीएमएस संवर्ग कानपुर। प्रति शव पोस्टमार्टम भत्ता।
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