एकादशी के दिन चावल न खाने के संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि चावल और अन्य अन्नों की खेती में क्या अंतर है। यह सर्वविदित है कि चावल की खेती के लिए सर्वाधिक जल की आवश्यकता होती है। एकादशी का व्रत इंद्रियों सहित मन के निग्रह के लिए किया जाता है। ऎसे में यह आवश्यक है कि उस वस्तु का कम से कम या बिलकुल नहीं उपभोग किया जाए जिसमें जलीय तत्व की मात्रा अधिक होती है। कारण-चंद्र का संबंध जल से है। वह जल को अपनी ओर आकर्षित करता है।
यदि व्रती चावल का भोजन करे तो चंद्रकिरणें उसके शरीर के संपूर्ण जलीय अंश को तरंगित करेंगी। परिणाम व्रत से गिर जाएगा या जिस एकाग्रता से उसे व्रत के अन्य कर्म-स्तुति पाठ जप श्रवण एवं पननादि करने थे; उन्हें सही प्रकार से नहीं कर पाएगा। ज्ञातव्य हो कि औषधि के साथ पथ्य का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है।
क्यो करते हैं एकादशी का व्रत
आपने कई लोगों को एकादशी का व्रत करते हुए देखा होगा। लेकिन क्या आपको पता है एकादशी का व्रत क्यो किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है- कि आत्मा को रथी मानो, शरीर का रथ और बुद्धि को सारथी मानो। इनके संतुलित व्यवहार से ही श्रेय की प्राप्ती होती है। इसके लिए इन्द्रियों का वश में होना और मन पर लगाम होना आवश्यक है।
ऋषियौं ने इस इन्द्रियौं के बाद मन को भी ग्यारहवीं इन्द्रिय माना है। इसलिए इन्द्रियों की कुल संख्या 11 होती है। एकादशी तिथि के दिन यदि मनोनिग्रह की साधना की जाए तो वह सद्य: फलवती सिद्ध हो सकती है। इसी वैज्ञानिक आशय से ही एकादशेन्द्रियभूत मन को एकादशी तिथि के दिन धर्मानुष्ठान एवं व्रतोपवास द्वारा निग्रहीत करने का विधान किया गया है। अर्थात एकादशी व्रत करने का अर्थ है- अपनी इन्द्रियों पर निग्रह करना।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें