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गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011
अच्छी सेक्स लाइफ से बढ़ता है प्यार
ब्लडप्रेशर में ना करें सेक्स
फलदायी है अशोक का पेड़
Rahul Tripathi
पार्कों में, स्कूलों में ओर अन्य सभी सार्वजनिक जगहों और घरों में अशोक का पेड व्यपक्ता के साथ पाया जाता
है। ऐसी मान्यता है कि इसे घर में लगााने या इसके जड को धारण करने से व्यक्ति को शोक नहीं होता तथा घर
में सुख समृद्धि आती है। इसे स्त्री निरीक्षणदोहक भी कहते हैं, क्योकि इसके सेवन से स्त्रियों के कई रोग मिट
जाते हैं और उनका सौन्दर्य में बृद्धि होती है। अशोक के क्या-क्या गुण है आइए जानते हैं-
सफलता के लिए
अशोक के एक पत्ती तोड कर सिर पर धारक कर लें। जिस काम को करने जा रहे हो वह निश्चित रूप से पूर्ण होगा।
धन संबंधी उपाय
अशोक वृक्ष की जड को विधिवत ग्रहण करने से कभी भी धन की कमी नही होती।आप चाहे इसकी जड को धन के स्थान पर रख सकते हैं। इससे घर में बरकत आती है।
दारिद्रता नाशक
दरिद्रता को नाश करने में यह वृक्ष सहायक है।इसके लिए अशो वृक्ष के फूल को प्रतिदिन पीस कर शहद के साथ मिला कर खाएं। कुछ दिन निरंतर खाते रहने से दरिद्रता का अंत हो जाएगा।हां इस दौरान धन देवी की पूा करते रहने चाहिए।शीर्घ ही इच्छा की पूर्ति होगी।
रोग नाशक
यदि अशोक के पेड की छाल उबाल कर उसके पानी को पिया जाए तो स्त्री के सारे रोग नष्ट हो जाएगे।इसके निरंतर प्रयोग से स्वास्थ्य सुधर जाता है और सौन्दर्य में निखार आता है।
चिंता नाशक
चिंता चिता की खान होती है लेकिन यदि रोजाना बासी मुॅह अशोक की तीन पत्ते खाए तो इस विकार से बचा जा
सकता है।
समस्त लाभसमस्त लाभ के लिएयदि अशो बीज को तांबे में भरकर ताबीज के रूप में धारण कियाा जाए तो लाभ प्राप्त होगा।
देवताओं को प्रसन्न करें
अशोक वृक्ष को काकुल वृक्ष माना जाता है अतः देवी-देवताओं पर इसे अर्पण करने से वे प्रसन्न होते हैं ऐसा करने
से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
एक लीटर में २४० किलोमीटर
आमिर खान की थ्री इडियटृस फिल्म कहती है कि यह देश आसाधरण प्रतिभाओं से भरा है। बस जरूरत है परंपरागत ढ़ाचे को बदलकर नई किरण जगाने की। इसी थीम पर थ््राी इडियट ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरी पर इलाहाबाद के शैलेन्द्र कुमार सिंह गौड की प्रतिभा के मामले में फिल्म और जमीनी हकीकत में अंतर है। मिस्टर शैलेन्द्र ने अपनी मोटर साइकिल के इंजन में बदलाव कर उसकी माइलेज तीन गुना बढ ा दिया। इलाहाबाद के मोती लाल नेहरू नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी के सामने उन्होंने अपनी मौअर बाइक को एक लीटर में ९८ किमी चलाकर दिखाया भी हैंऔर इंस्टीट्यूट इसे प्रमाणित भी करती है। धुन के पक्के शैलन्द का दावा है कि उनके द्वारा विकसित इंजन ने फिलहाल सामान्य इंजन की अपेक्षा प्रतिलीटर २४० का माइलेज दिया है पर अगर किसी अच्छी प्रयोगशाला में इसे बनाया जाए तो यह आकड ा ३०० किमी प्रति लीटर तक आसानी से पहॅंच सकता है। शैलेन्द्र ने बताया कि सामान्य इंजन इंटरनल कंबस्टन इंजन में पिस्टन की गति वर्टिकल होती है जबकि उन्होंने अपने संशोधित इंजन में इसे होरिजेन्टल कर दिया है। इसके अलावा इंजन की कनेक्टिंग रॉड और कैं्रक में भी परिवर्तन किया गया है। सामान्यतः इंटरनल कंबस्टन इंजन में ईधन का सिर्फ २६ प्रतिशत ही गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता हैं। जबकि उनके द्वारा निर्मित इंजन में ६० फीसदी तक ईधन गतिज ऊर्जा में तब्दील होता है। यदि इस तकनीकि को फॉलों किया जाए तो औसतन ५० से ६० फीसदी तेल की बचत आसानी से की जा सकती है। शैलेन्द्र ने अपने प्रोटोटाइप इंजन को पेटेन्ट करा लिया है और जल्द ही उसे अंतर्राष्टीय पेन्ट कराने के लिए अमेरिका भेजने की तैयारी कर रहे हैं।
--आभार सप्ताहिक नई दुनिया स्नेह मधुर
गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011
'आदि मानव शाकाहारी भी थे'
'आदि मानव शाकाहारी भी थे'
दो घंटे से ज्यादा कंप्यूटर खतरनाक
दिन भर में दो घंटे से ज्यादा वक्त कंप्यूटर गेम्स खेलने या टीवी देखने में बिताने वाले बच्चे गंभीर मानसिक बीमारी के शिकार हो सकते हैं। दूसरे कामों में दिखाई गई सक्रियता भी उन्हें इस खतरे से नहीं बचा सकती। ब्रिटेन में हुए एक रिसर्च में ये बातें सामने आई हैं। ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के छात्रों ने 10 से 11 साल की उम्र वाले 1000 बच्चों पर रिसर्च करने के बाद इस सच्चाई का पता लगाया है। रिसर्च के लिए चुने गए बच्चों को सात दिनों तक एक सवालों की लिस्ट में आँकड़े भरने को कहा गया। इन सवालों में पूछा गया था कि कितने समय तक उन्होंने टीवी या कंप्यूटर देखा। इसके साथ ही उनसे उनकी मानसिक दशा के बारे में भी सवाल किए गए। बच्चों से उनकी भावनात्मक और व्यावहारिक दिक्कतों के साथ ही संगी साथियों के साथ संबंध निभाने में आने वाली दिक्कतों के बारे में भी पूछा गया। इस दौरान एक मशीन के जरिए उनकी शारीरिक सक्रियता को भी मापा गया। रिसर्च के बाद जो नतीजे आए उनसे पता चला कि जिन बच्चों ने दो घंटे से ज्यादा वक्त टीवी या कंप्यूटर के साथ बिताया, उनमें से 60 फीसदी से ज्यादा बच्चों को मनोवैज्ञानिक दिक्कतें पेश आ रही हैं। टीवी के सामने दो घंटे से कम वक्त बिताने वाले बच्चों में ये दिक्कतें नहीं थीं। रिसर्च करने वालों का कहना है कि इन समस्याओं पर बच्चों की आयु, लिंग, आर्थिक सामाजिक स्थिति और दूसरी चीजों का कोई असर नहीं था। इसके साथ ही बाकी समय में बच्चों की सक्रियता ने भी समस्याओं पर कोई असर नहीं डाला। रिसर्च करने वाले डॉक्टर एंगी पागे ने बताया कि हम जानते हैं कि शारीरिक गतिविधियों में सक्रियता शरीर और मन दोनों के लिए अच्छी होती है, लेकिन इस बात के पक्के संकेत हैं कि ज्यादा देर तक स्क्रीन के सामने रहने के कारण नकारात्मक असर हो रहा है। इस बात के कोई प्रमाण नहीं कि अगर शारीरिक गतिविधियों में सक्रियता खूब ज्यादा हो तो स्क्रीन के साथ थोड़ी ज्यादा देर तक चिपका रहा जा सकता है। रिसर्च करने वाले छात्रों ने ये जरूर देखा कि शारीरिक मेहनत नहीं करने वाले छात्रों में मनोवैज्ञानिक दिक्कतें और बढ़ जाती हैं अगर वो स्क्रीन के साथ ज्यादा समय बिता रहे हों। इसके मुकाबले पढ़ने या होमवर्क करने में वक्त बिताने वाले छात्रों में किसी तरह की मनोवैज्ञानिक दिक्कतों के पैदा होने के कोई संकेत नहीं मिले।
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क्या इंटरनेट अमरीका के लिए भस्मासुर बन गया है? इंटरनेट का विकास अमरीका में हुआ लेकिन इन दिनों विकीलीक्स ने इंटरनेट पर लाखों गुप्त दस्तावेज़ प्रकाशित करके अमरीका को हिला कर रख दिया है. क्योंकि इंटरनेट पर लिखने के लिए अख़बार और टेलीविज़न जैसे संसाधन नहीं चाहिए. इसी वजह से विकीलीक्स ने ढाई लाख से ज़्यादा ऐसे गुप्त दस्तावेज़ जारी किए हैं जिन्हें दुनिया भर में फैले अमरीकी दूतावासों से भेजा गया था. इनसे ज़ाहिर होता है कि अपने सहयोगी देशों के बारे में अमरीका की सार्वजनिक और गुप्त राय में बहुत फ़र्क़ होता है. जनतंत्र, बोलने की आज़ादी और मीडिया की आज़ादी को अपना मूल सिद्धांत मानने वाली अमरीका और पश्चिमी देशों की सरकारें विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज से इस क़दर खार खा चुकी हैं कि उन्हें जेल भेजने और यहाँ तक कि उनकी हत्या करवा दिए जाने की बातें खुले आम की जा रही हैं. क्या जिस इंटरनेट को अमरीका की बौद्धिक ताक़त का प्रतीक माना जाता है वो अब अमरीका के गले की हड्डी बन गया है?